Saturday, October 4, 2014

मीडिया को कवरेज नही भागेदारी के लिये बुलाऐं- परवेज़

ताइवान और अमेरिका से संचालित होने वाली अर्न्तराष्ट्रीय संस्था गार्ड़न ऑफ होप फॉउन्डेशन की तरफ से एशियन ह्यूमन गर्ल्स राइटस् कान्फ्रेंस में बोलने का निमत्रंण मिला। चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में 28 सितम्बर 2014 से आयोजित इस चार दिवसीय अर्न्तराष्ट्रीय कान्फ्रेंस में एशियाई देशों के प्रतिनिधियों ने खासी संख्या में भागेदारी की। भारत की और से 30 सितम्बर को कान्फ्रेंस में भाषण दिया। देश का प्रतिनिधित्व करना और अपने पेशे से जुड़े विषय पर बोलना मेरे लिये रोमांचक होने के साथ-साथ गौरव की अनुभूति भी था। यहां मेरा वही भाषण पोस्ट कर रहा हूँ। आशा है आप पसंद करेंगे।
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नमस्कार।
एशियन गर्ल्स राइट कान्फ्रेंस के इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे माननीय सभापति एन्थोनी कारलसिस। इस कान्फ्रेंस को सफलता पूर्वक भारत में आयोजित करने वाले ताईवान के गैर सरकारी संगठन गार्ड़न ऑफ होप और उनके सहयोगी भारतीय गैर सरकारी संगठन युवासत्ता के सभी सम्मानित पदाधिकारी एंव स्वंयसेवियों.... भारत, ताइवान, पाकिस्तान, नेपाल समेत विभिन्न एशियाई देशों से इस कान्फ्रेंस मे भागेदारी करने आये सभी प्रतिनिधयों और इस सभागार में उपस्थित बालिकाओं के अधिकारों और उनके हितों की लड़ाई लड़ने वाले मेरे सभी सम्मानित साथियों...
सबसे पहले मैं इस आयोजन को सफलतापूर्वक भारत मे आयोजित करने के लिये बधाई देना चाहता हूँ गार्ड़न ऑफ होप संगठन को जिन्होने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिये भारत को चुना और हम सभी को इस आयोजन में भागेदारी करने का अवसर दिया। साथियों मेरा विषय है “बालिका अधिकारों के प्रति जागरुकता लाने में टेलीविज़न मीडिया की सक्रीय भूमिका”। भारत में जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में टेलीविज़न की पंहुच बढ़ी है और उसके माध्यम से सामाजिक परिवेश में जो बदलाव हुये हैं उन्हे किसी भी स्तर पर नकारा नही जा सकता है। मैं गैर लाभकारी संगठन (एनपीओ) स्मार्ट एजुकेशन एण्ड वैलफेयर एसोसिएशन ‘सेवा’ और परवेज़ सागर फॉउन्डेशन का संस्थापक होने के साथ-साथ एक टीवी पत्रकार हूँ। पिछले कई सालों से भारतीय पत्रकारिता और खासकर टीवी पत्रकारिता में कार्य कर रहा हूँ। मैने खुद टेलीविज़न मीडिया को भारतीय समाज पर असर करते देखा है और देख रहा हूँ। आज टेलीविजन मीडिया के बिना भारतीय सामाजिक परिवेश में सूचना और जनसम्पर्क की कल्पना करना भी बेमानी है। फिर भले ही वो समाचार टीवी चैनल हो या फिर मनोरंजन चैनल। भारत के घर-घर में पंहुचने का सबसे सुलभ और आसाना तरीका टेलीविज़न मीडिया है। जब हम विकास, शिक्षा और जागरुकता की बात करते हैं तो कहीं ना कहीं टेलीविज़न मीडिया की भूमिका उसमे शामिल होती है। ऐसे में बालिका अधिकारों और शिक्षा जैसे अहम मुद्दे को भी इस संचार माध्यम से अलग कर देखा नही जा सकता। लोगों को आसानी से बात समझाने के लिये बेहतर और आसान तरीका केवल टीवी है। साथियों आप सभी इस बात से सहमत होंगे कि हम किसी इंसान को जो बात लिखकर या कहकर नही समझा सकते... उसे चलचित्र यानि ऑडियो-वीडियों के रुप में लोगों को समझाना बेहद आसान है। और उसके लिये ये ज़रुरी नही कि सामने वाले व्यक्ति अनिवार्य रुप से शिक्षित या साक्षर हो।
साथियों भारत में ऐसी बालिकाओं और महिलाओं की कमी नही है जिन्‍होंने विभिन्‍न क्षेत्रों में नई ऊंचाइयों को छुआ है और नये कीर्तीमान भी स्थापित किये हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि आज भी कई कारणों से बालिकाओं को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई तरह से उनके अधिकारों का हनन होता है। वो चाहे अशिक्षा हो या फिर बाल विवाह जैसी कुरीति हो या यौन शौषण के बढ़ते हुये मामले... सभी में उनके मानव अधिकारों की अनदेखी और हनन होता है। भारत में हर साल इस तरह के हज़ारों मामले सामने आते हैं। बालिका अधिकार हनन, महिला हिंसा और महिला शोषण जैसे कई मामले आये दिन टीवी न्यूज़ चैनल्स के ज़रीये लोगों को पता चलते हैं। हमारी कोशिश रहती है कि इस तरह के मामलों में हम बिना पीडिता की पहचान बताये उसके साथ हुये अन्याय की जड़ तक जायें और अपने माध्यम से जो सकारात्मक सहयोग कर सकते हैं करें। यदि किसी भी स्तर पर इस तरह के मामले को दबाने या छिपाने के प्रयास किये जाते हैं तो हमारी कोशिश रहती है कि ऐसा ना हो पाये और सही तथ्य लोगों के सामने आयें। यहां मौजूद भारतीय साथियों को जानकारी होगी कि इस बात सबसे बड़ा उदहारण दिल्ली का निर्भया केस और यूपी के बदायूं का ताज़ा मामला है।
हमारे समाज में कई इस तरह के उदहारण है कि जिनमें टीवी मीडिया की भूमिका की वजह से बालिकाओं को किसी ना किसी स्तर पर न्याय मिला। ऐसे भी मामलों की कमी नही है जिनमें किसी भी तरह से पीड़िता या उपलब्धि हासिल करने वाली बालिकाओं के विषय में लोगों को टीवी के माध्यम से ही पता चल पाया। एक बड़ा उदहारण यहां आपके सामने रखना चाहुंगा जिसमें बालिकाओं के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य को मीडिया ने उजागार किया। कुछ वर्ष पूर्व यूपी के फ़र्रुखाबाद जिले में कम उम्र की लड़कियों को हार्मोन के इंजेक्शन देकर उन्हें समय से पूर्व ही बड़ा किये जाने और उनसे वेश्यावृत्ति कराये जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया था। इस मामले के मीडिया में आ जाने के बाद कई लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही हुई थी। यहां तक कि इस मामले की जांच में लापरवाही बरतने वाले कई अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही हुई थी।
ऐसा ही एक और प्रकरण यूपी में वर्ष 2012 में सामने आया था जिसमें पूर्वांचल में बालिकाओं के लिये संचालित कथित विश्वविद्यालय में ही उनके साथ अमानवीय कार्य किये जा रहे थे। मामला मीडिया में आने के बाद इस मामले में आरोपियों को जेल भेजा गया।
यहां तक कि इस तरह के मामले भी टेवीविज़न मीडिया के माध्यम से ही लोगों को सामने उजागार हुये जिनमें बालिकाओं को बाहर से लाकर बेच दिया जाता है। घरों में काम कराने के नाम पर उनके साथ यौन शोषण और हिंसा की जाती है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस तरह के मामलों में पाया गया कि उडीसा, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से बड़े स्तर पर ऐसी बालिकाओं को लाया जाता है जिनके घरों में धन की कमी हो या फिर उनके परिवार भुखमरी के कगार पर हों। टीवी मीडिया के माध्यम से उजागार होने वाले इस तरह के मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग के साथ बाल विकास से जुड़े लोगों ने भी आगे आकर कार्यवाही के लिए दबाव बनाया। 
स्मार्ट एजुकेशन एण्ड वैलफेयर एसोसिएशन ‘सेवा’ और परवेज़ सागर फॉउन्डेशन का मानना है कि बालिकाएं भारतीय समाज का सबसे नाज़ुक हिस्‍सा है। जिस तरह से उनके प्रति होने वाले अपराध और हिंसा के मामले बढ़े हैं यकीकन वो चिन्ताजनक हैं। यही नही बाल विवाह के मामलों में बांग्लादेश के बाद भारत का विश्व मे दूसरा स्थान है। यूनीसेफ की एक रिर्पोट के मुताबिक दक्षिण एशिया में कुल बालिकाओं की संख्या से आधी बालिकाओं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। और पांच में से एक बालिका की शादी 15 साल से पहले हो जाती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये दुनिया में सर्वोच्च दर है। भारत में वर्ष 2005 और 2013 के बीच 43 फीसदी बालिकाओं की शादी 18 साल की उम्र तक कर दी गयी। 10 साल तक की जिन बालिकाओं को स्कूल नही भेजा जाता उनकी शादी की सम्भावनाऐं बढ़ जाती हैं। एशिया में लिंग अनुपात के मामले में अभी भी भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हालात बेहतर नही हैं। इस तरह से इन देशों में बालिका अधिकार हनन के मामलों की संख्या भी ज्यादा है।
2011 की जनगणना से पता चलता है कि कुल लिंग अनुपात 933 से बढ़कर 940 हो गया है। लेकिन 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों के अनुपात में गिरावट आई है यानी बच्‍चों का लिंग अनुपात जो 2001 में 927 था वह 2011 में 914 हो गया। नई जनगणना से साफ कि भारत के 22 राज्‍यों और 5 संघ शासित क्षेत्रों में बच्‍चों के लिंग अनुपात में गिरावट आई है। राष्‍ट्रीय परिवार स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार 43 प्रतिशत बालिकाऐं सही देखभाल के अभाव में आज भी कुपोषित हैं। ये उनके मानवीय अधिकारों के हनन की बड़ी मिसाल है।
टेलीविज़न मीडिया की का सहयोग कैसे लें ?
     साथियों भारत में टेलीविज़न मीड़िया की महत्ता पर मैने पहले ही आपको बताया और आप सभी पहले इन सब तथ्यों से वाकिफ भी हैं। कुछ साल पहले तक केवल राष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल होते थे। जिन पर स्थानीय समाचारों या मुद्दों को जगह मिलना आसान नही था। लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत में प्रादेशिक समाचार चैनलों की संख्या में खासा इज़ाफा हुआ है। हर राज्य में कई-कई प्रादेशिक समाचार एंव मनोरंजन चैनलों का प्रसारण हो रहा है। प्रादेशिक समाचार चैनलों के आने से नगर स्तर तक की ख़बरों का टीवी पर चलना आसान हो गया है। ऐसे में जो एनजीओ या एनपीओ इस बालिका विकास और अधिकारों के लिये काम कर रहे हैं उन्हे चाहिये कि वो अपने क्षेत्रीय एंव प्रादेशिक समाचार माध्यमों खासकर टेलीविज़न मीडिया के साथ संवाद स्थापित करें। बालिकाओं के साथ होने वाले अपराधों और मानवाधिकार हनन के मामलों को पुलिस के साथ-साथ मीडिया से भी साझा करें। सही तथ्यों को मीडिया के समक्ष रख कर पीड़िता को न्याय दिलाने के प्रयास करें। मैं ये नही कहता कि हम मीडिया वाले खुद किसी को न्याय दे सकते हैं लेकिन हमारे प्रयास से दबाव बनाने की रणनीति सार्थक हो सकती है। यदि आप किसी एनजीओ या एनपीओ का संचालन करते हैं तो आप मीडियाकर्मीयों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करने के लिये उनके साथ कार्यशाला आदि का आयोजन करें। अपनी बातों को उनके समक्ष रखने के साथ-साथ बालिका अधिकारों और शिक्षा जागरुकता सम्बंधी आयोजनों और जानकारी को उनके साथ साझा करें।
मीडिया के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने और बालिकाओं को नए अवसरों की पेशकश की जाये। बालिकाओं के सामने आने वाली सभी असमानताओं को समाप्‍त करने के सार्थक प्रयास हों। साथ ही यह सुनिश्‍चित किया जाये की प्रत्‍येक बालिका को उचित सम्‍मान, मानवाधिकार और भारतीय समाज में मूल्‍य मिले। टीवी मीडिया पर इस तरह की बहस आयोजित हों जिनमें बालिकाओं पर लगे सामाजिक कलंक से मुकाबला करने और बच्‍चों के लिंग अनुपात को खत्‍म करने के सम्बंध में बात की जाये। ऐसे समाचारों या कार्यक्रमों के माध्यम से बालिकाओं की भूमिका और उनके महत्‍व के बारे में जागरूकता को बढावा दिया जाये जो बालिकाओं के स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, पोषण आदि से जुड़े हों। हमारी संस्था स्मार्ट एजुकेशन एण्ड वैलफेयर एसोसिएशन ‘सेवा’ और परवेज़ सागर फॉउन्डेशन ने अपने कार्यक्रमों और जागरुकता अभियानों में हमेशा स्थानीय मीडिया को शामिल करने की पहल की है। हमने उन्हे कार्यक्रमों की कवरेज के लिये नही बल्कि भागेदारी के लिये आमंत्रित किया।
यदि आपको लगता है कि किसी समाचार चैनल पर ऐसी कोई ख़बर या कार्यक्रम चल रहा है जो बालिका अधिकारों का हनन करता है या सामाजिक तौर पर उसके सम्मान को ठेस पंहुचती है। तो कभी भी भारतीय समाचार टेलीविज़न चैनलों के संगठन एनबीए को इसकी शिकायत कर सकते हैं।
सबसे अहम ज़रुरत इस बात की है कि टेलीविज़न मीडिया के साथ संवाद स्थापित किये जाना चाहिये। और उनको अपने कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाये। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि मीडिया वाले उनके कार्यक्रम में नही आते या उनके कार्यक्रम की ख़बर नही दिखाते... मगर ऐसा क्यों होता है ये समझना भी ज़रुरी है। दरअसल हर समाचार चैनल अपनी ख़बरों और कार्यक्रमों का स्तर और समय पहले ही तय कर लेता है। राष्ट्रीय समाचार चैनलों और प्रादेशिक या स्थानीय समाचार चैलनों की प्राथमिकता भी अलग-अलग होती है। किसी संगठन या बालिका अधिकारों या हनन के समाचार प्रसारित किये जाना इस बात पर भी निर्भर करता है कि मीडिया के समक्ष वो मामला किस तरह से प्रस्तुत किया गया। यदि पीड़िता या एनजीओ अपनी बात या सूचना को सही तथ्यों के साथ टीवी मीडिया के समक्ष नही रख पाते या फिर समाचार अथवा कार्यक्रम के अनुसार चलचित्र, विजुअल यानि ऑडियो-वीडियो नही मिल पाते तो समाचार को प्रसारित करना किसी भी टीवी चैनल के लिये मुश्किल हो जाता है।
समय की कमी है इसलिये संक्षेप में मनोरंजन टीवी चैनल्स की अगर बात की जाये तो वहां भी बालिका एंव महिला अधिकारों, शिक्षा और शोषण जैसे विषयों पर कई कार्यक्रम अथाव धारावाहिक जिन्हे हम सीरियल भी कहते हैं, प्रसारित हो रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा उदहारण है कि कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला धारावाहिक ‘बालिका वधु’ जिसकी नायिका आनंदी खुद बाल विवाह का शिकार होने के बाद हिम्मत से काम लेती है और फिर दूसरी बालिकाओं को बाल विवाह से बचाकर शिक्षा की राह पर चलाती है। सामाजिक कुरितियों को विरोध भी इस टीवी सीरियल में दिखता है। ज़ी के नये मनोरंजन चैनल ज़िन्दगी पर भी “कितनी गिरहें बाकी हैं....” नामक एक पाकिस्तानी सीरियल का प्रसारण हो रहा है जो बालिकाओं और महिलाओं के साथ होने वाले घरेलू और सामाजिक अत्याचारों को उजागर करने का काम कर रहा है। इसी तरह से देश के तमाम मनोरंजन चैनल बालिका अधिकारों पर आधारित कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं।
अंत में एक बार फिर से इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि बालिका और महिला अधिकारों और उनकी शिक्षा से जुड़े मुद्दों को मीडिया के सामने मज़बूत तथ्यों के साथ पेश किया जाना चाहिये ताकि समाचार प्रसारित करने वाले चैनल के लोग आपके कार्यक्रम या समाचार का चुनाव प्रसारण के लिये कर सकें। क्योंकि भारत ही नही बल्कि पूरे विश्व में लोगों को अपनी बात समझाने का सबसे सरल तरीका टेलीविज़न है। मैं एक बार फिर से अपने संगठन स्मार्ट एजुकेशन एण्ड वैलफेयर एसोसिएशन ‘सेवा’ और परवेज़ सागर फॉउन्डेशन की और से आभार जताना चाहूँगा गार्ड़न ऑफ होप संस्था और उनके सभी सहयोगियों को जिन्होने एक संवेदनशील मुद्दे को लेकर भारत में ये सफल और सार्थक आयोजन किया। और मुझे अवसर दिया कि मैं अपनी बात आप जैसे सुधीजनों के बीच रख सकूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद.... शुक्रिया।
जय हिन्द।
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परवेज़ सागर

Friday, September 12, 2014

सपा-भाजपा ने उपचुनाव में झोंक दी पूरी ताकत

लखनऊ ( परवेज़ सागर )। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर SP और BJP उपचुनाव में आमने-सामने है। समाजवादी पार्टी ने एक लोकसभा और 11 विधान सभा सीटों पर जीत हासिल करने के लिये पूरी ताकत लगा दी है। उधर, BJP भी इस चुनाव में अधिक से अधिक सीटों को बचाने के लिये कमर कस ली है। गौरतलब है कि यूपी की जिन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है वो सभी BJP के पास थी। इस चुनाव के लिये गुरुवार की शाम चुनाव प्रचार थम जाएगा।
सूबे में एक बार फिर से चुनावी बिसात बिछ गयी है। यहां 13 सितम्बर को मैनपुरी लोकसभा और 11 विधान सभा सीटों पर मत डाले जायेंगे। इस उपचुनाव के लिये SP और BJP के अलावा कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। मैनपुरी और आज़मगढ़ लोक सभा सीटों से SP मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जीत हासिल की थी। बाद में आज़मगढ़ से ही सांसद बने रहने का फैसला किया था तभी से ये सीट खाली थी। इस सीट से उन्हीं के परिवार के तेज प्रताप यादव किस्मत आज़मा रहे हैं। BJP के 11 विधायकों के सांसद बन जाने से खाली हुई सीटों पर SP और BJP के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। हालाकि SP अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नज़र आ रही है।
उपचुनाव में जिन सीटों पर चुनाव होना है उनमें कैराना, सिराथू, चरखारी, सहारनपुर नगर,  ठाकुरद्वारा,  बलहा,  नोएडा,  लखनऊ पूर्वी, बिजनौर,  निघासन और हमीरपुर विधान सभा सीट शामिल हैं। इन सभी सीटों पर 2012 के विधान सभा चुनाव में BJP के उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था। पार्टी उपचुनाव में भी इन सीटों को फिर से हासिल करना चाहती है। केन्द्र में सरकार आ जाने से BJP नेताओं के हौसले बुलंद हैं। इसलिये वो उपचुनाव में भी जीत का दावा कर रहे हैं।
इस उपचुनाव में BSP ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है लेकिन कांग्रेस सभी विधान सभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस के UP प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री और PCC अध्यक्ष निर्मल खत्री खुद चुनाव की कमान संभाल रहे हैं। कांग्रेस भी करीब तीन विधान सभा सीटों पर अपनी जीत का दावा कर रही है।
कांग्रेस नेता जो भी दावा करें लेकिन इस उपचुनाव में उनकी पार्टी का वजूद कहीं नज़र नहीं आ रहा है। लेकिन BJP एक बार फिर से उपचुनाव में विकास और कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है। उधर, समाजवादी पार्टी अपनी सरकार की उपलब्धियों और जनहित योजनाओं को जनता के बीच रखकर वोट मांग रही है। SP, BJP को साम्प्रदायिक दल बताकर जनता से आपसी भाईचारे को मजबूत करने की अपील भी कर कर रही है।

Wednesday, August 20, 2014

जंग-ए-आज़ादी में अहम मुकाम है लखनऊ का

परवेज़ सागर।
देश की आजादी के लिए लड़ी गई जंग में लखनऊ शहर की अहम भूमिका रही है। यहां जंग-ए-आज़ादी में कई नवाबों और स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना योगदान दिया। सबसे अहम बात है कि अवध के नवाबों के साथ-साथ उनकी मलिकाओं ने भी अंग्रेजों से लडाई लड़ी।
तहज़ीब और अदब का शहर लखनऊ। इस शहर में कई ऐसी निशानियां मौजूद हैं जो जंग-ए-आजादी की गवाह हैं। रेजीडेन्सी हो या फिर बेगम हजरत महल पार्क, बड़ा इमाम बाड़ा हो या फिर कैसरबाग ये सभी वो जगह हैं, जहां 1856 के बाद से ही कई बार आजादी के दिवानों और अंग्रेजों के बीच आर-पार की लड़ाई हुई।
स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जलते ही उसकी आग लखनऊ पहुंच गई थी। उस वक्त अवध के शासक नवाब वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने से मना कर दिया था। जिसके बाद अंग्रेज आपा खो बैठे और कई आन्दोलनकारियों को अपना बलिदान करना पड़ा।
अवध में जब आजादी के दिवानों ने अंग्रेजी हुकुमत की खिलाफत शुरू की तो उन पर अत्याचार भी बढ़ने लगे। इस दौरान आजाद भारत की मांग बढ़ते देख अंग्रेजों ने लखनऊ के कैसरबाग पर हमला किया था। जिसमें कई लोगों ने अपना बलिदान दिया। अंग्रेजों की ताकत बढ़ती देख नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हजरत महल भी इस जंग में कूद पड़ी। नवाब साहब को लखनऊ छोड़ना पड़ा तो उनकी गैर मौजूदगी में बेगम हजरत महल ने कमान संभाल ली।
1856 से शुरू हुआ सिलसिला बहुत आगे तक बढ़ गया। बहादुर शाह जफर के बाद उनके कई वारिस इस लड़ाई में कूद पड़े। रानी लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे ने भी लखनऊ में चल रहे आन्दोलन को अपना समर्थन दिया था। उन्होंने बेगम हजरत महल के हौसले की तारीफ की थी।
जंग-ए-आज़ादी के दौरान अंग्रेजों ने लखनऊ की कई ऐसी आलीशान इमारतों को उड़ा दिया जो यहां की सांस्कृतिक विरासत मानी जाती थी। एक दौर ऐसा भी आया कि अंग्रेजों ने बड़े इमाम बाड़े को छावनी में तब्दील कर दिया था। देश आजाद हो जाने के बाद भी इस शहर में आज ऐसी कई निशानियां बाकी हैं जो गुजरे हुए कल की याद दिलाती हैं। आज यहां के लोग उन किस्सों को बयां करते हैं जो जंग-ए-आजादी के दौरान यहां गुजरे थे। आजादी की लड़ाई के इतिहास में अवध की शान लखनऊ का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

Sunday, September 8, 2013

खतरें में पत्रकार....।

खतरें में पत्रकार....।
देशभर में पत्रकारों पर हो रहे जानलेवा हमले चिन्ताजनक है। हालात ये है कि फील्ड रिर्पोटिंग हो या हिंसक घटनाओं की कवरेज सभी जगह पत्रकार बिल्कुल सुरक्षित नही है। मुज़फ्फरनगर जिले में पिछले एक सप्ताह से चल रही हिंसा में दो पत्रकारों की दर्दनाक मौत हो गयी। आईबीएन-7 के पत्रकार राजेश वर्मा की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई तो एक फोटो पत्रकार इसरार अहमद की भी मौत हो गई। इन दोनों पत्रकारों की मौत से प्रदेशभर के पत्रकारों में शोक की लहर है। हम सभी पत्रकार इनकी आत्मिक शांति के लिये प्रार्थना करते हैं। हम केन्द्र और सभी राज्य सरकारों से पुरज़ोर मांग करते हैं कि आये दिन पत्रकारों पर हो रहे जानलेवा हमलों पर रोक लगाये और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठायें ताकि हम अपना कार्य निड़रता और निष्पक्षता के साथ कर सकें।

     असामायिक मृत्यु का शिकार हुये पत्रकार राजेश वर्मा को मैं दस साल पहले मुज़फ्फरनगर में मिला था। उन दिनों में सहारा समय- उत्तर प्रदेश के लिये काम कर रहा था। जब भी वहां कवरेज के लिये जाना होता था तो राजेश से मुलाकात हो जाती थी। वो बहुत हंसमुख होने के साथ-साथ एक अच्छे वीडियो जर्नालिस्ट भी थे। उनकी दुखदायी मुत्यु की सूचना से मैं आहत हूँ। प्रिय राजेश, तुम हमेशा याद आओगे।

Saturday, August 31, 2013

हमारे देश में ये कैसा कानून....?

हमारे देश की सर्वोच्च अदालत भले ही ये कहती हो कि बलात्कार और यौन हिंसा जैसे संगीन मामले के आरोपी को तुरन्त गिरफ्तार किया जाना चाहिये लेकिन आसाराम की गिरफ्तारी में की जा रही सरकारी लापरवाही ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे देश का कानून वाकई दो तरह से काम करता है। इसका आचरण आम आदमी के लिये अलग है और खास आदमी के लिये अलग.... अगर ऐसा ना होता तो बलात्कार और यौन हमले का आरोपी बाबा सलाखों के पीछे होता। यहां तो कानून के रखवालों ने ही उस बाबा को छिप जाने का मौका दे दिया।

Tuesday, August 27, 2013

आगरा में पुलिस वाले लूटेरों से सावधान...!

सावधान.....!
अगर आप देर रात आगरा शहर में कहीं आ-जा रहे हैं और आप अकेले हैं तो आगरा पुलिस के बहादुर जवान आपको तलाशी के नाम पर लूट सकते हैं। अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाला एतिहासिक शहर आगरा.. अब कुछ पुलिस वालों की करतूतों से बदनाम हो रहा है। शहर में चीता मोबाइल का गठन इसलिये किया गया था कि पुलिस किसी भी घटना स्थल या शिकायत पर तुरंत पहुंच जाये। इस चीता मोबाइल में बाइक पर दो हथियारबंद पुलिस वाले सवार रहते हैं। जिन्हे वायरलैस रेडियो भी दिया जाता है। लेकिन आज कल चीता मोबाइल वाले जनता की रक्षा नही बल्कि उनसे लूट करने पर आमदा हैं। इस तरह की शिकायतें आये दिन आ रही हैं।
हाल ही में शमशाबाद रोड़ की एक नई कॉलोनी में रहने वाले ब्रजेश गर्ग अपने किसी काम से ग्वालियर गये थे। रविवार की देर रात वो ट्रेन से आगरा कैन्ट पहुंचे। वहां स्टैण्ड पर खड़ी अपनी बाइक लेकर वो शमशाबाद रोड़ जाने के निकल गये। रात के लगभग दो बजे जब वो माल रोड़ से गुज़र रहे थे, तभी एएसआई ऑफिस के सामने चीता मोबाइल सवार दो पुलिस वालों ने उन्हे रोक लिया और उन पर रोब झाड़ते हुये बाइक के कागज़ और उनका ड्राइविंग लाइसेंस चैक किया। उसके बाद दोनों पुलिस वालों ने तलाशी के नाम पर उनकी जेब में रखे 2100 रुपये और उनका मोबाइल निकाल लिया। मोबाइल को देखने के बाद वो तो वापस कर दिया लेकिन रुपये उन्होने अपने वापस रख लिये। जब ब्रजेश गर्ग ने रुपये वापस मांगे। तो उन्होने गर्ग साहब को चोरी के मामले में फंसाने के नाम पर डराना शुरु कर दिया। 42 साल के ब्रजेश गर्ग इतना घबरा गये कि पुलिस वालों की धमकी सुनकर चुपचाप वहां से निकल गये। आज ब्रजेश गर्ग एक कार्यक्रम में मुझे मिले और उन्होने मुझे पूरी आपबीती सुनाई। मैने कहा कि आपने सुबह एसएसपी या एसपी सिटी से शिकायत क्यों नही कि तो उनका जवाब था कि चीता मोबाइल सवार पुलिस वाले उन्हे किसी भी झूठे मामले में फंसा देंगे क्योंकि उन्होने मेरा नाम-पता भी ले लिया था।

ब्रजेश गर्ग अकेले पीड़ित नही हैं इससे पहले भगवान टॉकीज़ के पास एक एलपीजी एजेंसी पर काम करने वाला बॉबी भी चीता मोबाइल वालों की लूट का शिकार हुआ था। यहां तक कि शहर में कई जगहों पर अवैध धंधे भी इन्ही चीता मोबाइल वालों के संरक्षण में चल रहे हैं। इन्हे कई सफेद पोशों और स्थानीय पत्रकारों का संरक्षण भी मिला होता है। यही वजह है कि इनके खिलाफ कार्यवाही करने में अधिकारी ढीले पड़ जाते हैं। लेकिन अगर इन पुलिस वालों की लूटमार यूँ जारी रही तो शहर की आम जनता का विश्वास पुलिस से उठ जायेगा। यूपी सरकार और पुलिस महकमें की छवि खराब करने वाले ये लोग वर्दी वाले गुण्डे बनकर ही लूट करते रहेंगे।

Friday, August 16, 2013

अमेरिकी भैंसों की ख़बर हमारे चैनल्स पर...

हमारे देश के दो प्रमुख हिन्दी समाचार चैनल अमेरिका के एक शहर की ख़बर दिखा रहे थे। ख़बर ये थी कि अमेरिका के एक स्टेट हाइवे पर दर्जनों भैंसों के आ जाने से वहां का ट्रेफिक करीब आधा घंटा रुका रहा। कमाल तो ये है कि हमारे देश का शायद ही कोई ऐसा नेशनल हाइवे या स्टेट हाइवे हो जिस पर रोज़ाना भैंस या अन्य जानवर ना मिलते हो। यही नही उनकी वजह से आये दिन कई सड़क दुर्घटनाऐं भी होती रहती हैं। लेकिन इस तरह के समाचार हमारे नेशनल न्यूज़ चैनल्स पर यदा-कदा दिखाई देते हैं। आगरा में विश्व धरोहर स्मारक ताजमहल के पूर्वी गेट के सामने से तो सुबह शाम सैंकड़ों भैंसे निकलती हैं और विदेशी पर्यटक जमकर उनकी तस्वीरें लेते हैं और ये मंज़र देख कर हैरान होते हैं लेकिन अस बात की सुध किसी को नही है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेकर ताज महल के आस-पास से तबेले हटवाये और ताजमहल के पीछे यमुना में भैंसों के नहाने पर रोक भी लगाई लेकिन उसके बावजूद ये सिलसिला आज तक जारी है। आगरा ज़िला प्रशासन की लापरवाही से विदेशी पर्यटकों के सामने शहर की छवि तो बिगड़ती ही है साथ ही कई बार यहां हादसे भी हो जाते हैं। लेकिन हमारे न्यूज़ चैनल्स ऐसी ख़बरों पर ध्यान नही देते।

Friday, August 2, 2013

शहरी समाज में भी लड़कियों के साथ होता है भेदभाव

भारत के शहरी समाज में आज कई ऐसे रुढीवादी उदहारण देखने को मिलते हैं जो हमें वर्तमान सामाजिक परिवेश के बारे में नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर देते हैं। दो दिन पहले एक कार्यक्रम में मुझे एक डिग्री कॉलेज की छात्राओं को पत्रकारिता और महिला शिक्षा जैसे विषय पर सम्बोधित करने का मौका मिला। पिछले कई सालों से लड़कियों और बच्चों की शिक्षा को लेकर काम कर रहा हूँ तो आदत में आ गया है कि छात्राओं और बच्चों से अक्सर उनकी परेशानियां भी पूछ लेता हूँ। विषय पर अपनी बात कहने के बाद बी.कॉम प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने मुझे बताया कि वो शहर के ही एक इलाके में रहती है। जब वो इंटर कर रही थी तो एक लड़का उसका पीछा करने लगा। वो ऑटो से कॉलेज जाती थी तो वो लड़का रोज़ाना साइकिल से उसका पीछा करता था। कॉलेज से लौट आने के बाद उसके घर के चक्कर लगाया करता था। दस दिन बीत जाने पर उस छात्रा ने ये बात अपनी एक सहेली से कही। सहेली ने उस छात्रा को सलाह दी कि ये बात अपने घर वालों को बता दे। सहेली की बात मानकर उसने लड़के के बारे में अपने घर वालों को सारी बात बता दी। नतीजा ये हुआ कि घरवालों ने उस लड़की के कॉलेज जाने पर रोक लगा दी। उसका घर से निकलना, छत पर जाना और घर के गेट तक पर खड़ा होना तक बंद कर दिया गया। उस छात्रा के परिवार ने पीछा करने वाले लडके के खिलाफ कुछ करने के बजाय उस छात्रा को ही घर में बंद रहने के लिये मजबूर कर दिया। बड़ी मुश्किल से दो माह बाद उसे कॉलेज के इम्तिहान की वजह से घर से बाहर अपने माता-पिता के साथ बाहर जाने की इजाज़त दी गयी। उस छात्रा ने बड़ी मासूमियत से मुझसे ही सवाल किया कि सर आप बतायें कि क्या मैने अपने घरवालों को उस लड़के के बारे में बताकर ग़लत किया था? जो मुझे ही उसकी सज़ा मिली। उस छात्रा की बात सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि वाकई अभी भी एक पढ़ा लिखा परिवार अपने घर की बेटी के साथ ऐसा बर्ताव कैसे कर सकता है। मुछे भी उसकी बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया। वाकई इस मामले में उस लड़की की ना तो कोई ग़लती थी और ना ही उसने अपने घरवालों से कुछ छिपाया। फिर भी एक अनजान लड़के की हरकत से उस लड़की के दिल में एक घृणा का भाव पैदा हो गया जो लड़कों को लेकर भी थी और परिवार के प्रति भी। मैने अपने स्तर पर उस लड़की को बेहतर जवाब देने कि कोशिश की। लेकिन ताजुब्ब होता कि आधुनिकता के इस दौर में भी घरवाले बेटियों के साथ ही ऐसा क्यों करते हैं? उस लड़की का सवाल ग़लत नही था। हो सकता है कि अभी भी वो इस तरह की कुछ परेशानियों का सामना करती हो। मैने उसे तो हौंसला दे दिया लेकिन ऐसी ही कई लड़कियां हमारे समाज में और भी हैं उनका क्या?

-          -परवेज़ सागर

Tuesday, June 18, 2013

धीमा ज़हर पी रहे हैं आगरावासी

उत्तरी भारत में पानी के सैलाब से कोहराम मचा हुआ है। खासकर उत्तराखंड़ और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में बाढ़ की आशंका को देखते हुये रेड़ अलर्ट जारी किया गया है। लेकिन उत्तर प्रदेश में यमुना से लगा एक ज़िला ऐसा भी हैं जहां के लोगों के पिछले दो दिनों से सीवर का गंदा पानी सप्लाई किया जा रहा है। ये ज़िला है आगरा, जहां जल निगम और जल संस्थान शहर में गंदे और बदबूदार पानी की सप्लाई कर रहा है। उस पर कमाल की बात ये है कि ज़िले के आला प्रशासनिक अधिकारी पत्रकारों को बुलाकर शहर के लोगों को गंगाजल सप्लाई करने की योजना बता रहे हैं। गौरतलब है कि सूबे की सरकार और आगरा का ज़िला प्रशासन शहरवासियों को पीने के पानी के लिये गंगाजल की सप्लाई का ख्वाब पिछले कई सालों से दिखा रहा है। अधिकारी हों, चाहे नेता सब मीडिया के सामने गंगाजल शहर में लाने के बड़े-बड़े वादे करते रहते हैं लेकिन ये वादे कभी पूरे नही होते। अब पिछले दो दिन से कोई अधिकारी ये जानने वाला नही है कि लोगों के घरों में सीवर का गंदा और बदबूदार पानी क्यों सप्लाई किया जा रहा है। कोई शिकायत सुनने वाला नही है। ग़रीब मलिन बस्तियों और झुग्गियों के लोग तो इसी पानी को पीने के लिये भी इस्तेमाल करते हैं। आगरा में ये कोई नई बात नही है। यहां आये दिन अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही की वजह से लोगों के घरों में गंदा सीवर का पानी सप्लाई किया जाता है। ऐसे में आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि पिछड़े इलाकों में लोग किस तरह से ये ज़हर पी कर रोज़ाना थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं। ज़रुरत इस बात कि है कि सरकार और ज़िला प्रशासन वादे करने की बजाय ज़मीनी स्तर पर काम करे। अधिकारी अपनी लापरवाही और लालच को छोड़कर शहर के लोगों को पीने का पानी तो कम से कम ठीक से सप्लाई करें। क्योंकि इस शहर में रहने वाले सभी लोग मिनरल वॉटर से ना तो नहा सकते हैं और ना ही उसे पी सकते हैं।
-परवेज़ सागर