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Monday, May 11, 2009

ज़िन्दगी को मौत के पहलू मे पाता हूँ....

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ऐ काश देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को,
मैं जब तारों पर नज़रें गड़ाकर आंसू बहाता हूं
तसव्वुर बन के भूली बातें याद आती हैं,
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्‍दत से पहरों तिलमिलाता हूं
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबिदा उमंगों को जगाती है,
तो अपनी ज़िन्दगी को मौत के पहलू में पाता हूं
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Saturday, March 7, 2009

दुनिया ये समझती है...

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़मों से नफ़रत है,
मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है
मेरी फ़ितरत को खूं-रेज़ी के अफ़सानों से रग़बत है,
मेरी दुनिया में कुछ वक़त नहीं है रक़्स-ओ-नग़मे की
मेरे महबूब नग़मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है।

ज़िन्दगी से जुड़े कुछ अशआर

तुम तकल्लुफ को भी इखलास समझते हो फ़राज़,
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
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कोई काँटा चुभा नहीं होता
अगर फूल सा नहीं होता,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।
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ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे,
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे।