Friday, March 22, 2013

कमाल पर हमला शर्मनाक


उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एनडीटीवी के दफ्तर में घुसकर कुछ लोगों ने हमारे साथी और वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान पर आतंकियों से सम्बंध बताते हुये हमला बोल दिया जो कि अपने आप में बड़ी शर्मनाक घटना है। पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार भी किया है जो अपने आप को हिंदू महासभा का अध्‍यक्ष बता रहा है। आरोपी का नाम कमलेश है जो अपने दर्जनभर साथियों के साथ एनडीटीवी के दफ्तर पहुंचा और गार्ड के रोकने पर भी ऑफिस में घुस गया इससे पहले उसने अपने साथियों के साथ मिलकर गार्ड़ के साथ मारपीट की। बाद में वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान से बदसलूकी और हाथा-पाई की। इस मामले में हालाकि कमाल ने पुलिस को शिकायत दर्ज करा दी है। जिसके बाद पुलिस ने मामूली धाराओं में मुकदमा दर्ज कर एक आरोपी को गिरफ्तार कर चालान  कर दिया। मैं और मेरे सभी पत्रकार साथी इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं। और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इस तरह के मामलों में सख्त कदम उठाये जाने की मांग करते हैं। ताकि हम अपना काम निष्पक्ष और निडरता से कर सकें।

Saturday, March 2, 2013

हमेशा ऐसा क्यों नही रहता लाल किला

आगरा में चल रहे ताज महोत्सव में भले ही इस साल कुछ नयापन नही था। लेकिन अभी तक महोत्सव के दौरान हुये दो आयोजन खास रहे। इनमें एक था वड़ाली ब्रदर्स नाईट और दूसरा आगरा किला में आयोजित किया गया शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम जिसमें उस्ताद शाहिद परवेज़ का सितार वादन और 105 साल के पदम् भूषण उस्ताद रशीद खाँ की बंदिशे खास थी। हालाकि हमेशा की तरह विभागीय लापरवाही से इन दोनों कार्यक्रमों में श्रोताओं की संख्या कुछ खास नही थी। लेकिन 25 फरवरी की रात आगरा किले के दिवान-ए-आम में आयोजित शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में किले का नज़ारा एक दम बदला हुआ नज़र आया। किले के अन्दरुनी हिस्सों को सजाने के लिये लाइट्स का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया। खूबसूरत कैंडिल लाइट्स भी कम नही थी। उस पर उस्ताद शाहिद परवेज़ और उस्ताद रशीद खान के सुरों ने माहौल को खुशनुमा बना दिया। इस नज़ारे को देखने वाले भले ही कम थे लेकिन ये सच में लाजवाब था। यहां कुछ लोगों ने कहा भी कि अगर यहां ऐसा हमेशा किया जाये तो लालकिला आगरा में रात्रि पर्यटन का खास केन्द्र बन सकता है। भले ही ये बात एएसआई और सरकारी महकमों की समझ में ना आये लेकिन ये सच है। यहां कुछ तस्वीरे आप लोगों के लिये डाल रहा हूँ उम्मीद है कि आपको पसंद आयेंगी, वैसे आप भी देखकर बतायें।

Monday, December 24, 2012

पत्रकारों पर हमला... शर्मनाक

रविवार का दिन पत्रकारों के लिये परेशानी भरा रहा।
दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पत्रकारों को भी नही बख्शा हमारे कई पत्रकार साथी गंभीर रुप से घायल हो गये। इस घटना के बाद भले ही दिल्ली पुलिस मीडिया के सवालों से बच रही है। लेकिन पुलिस का जो बर्ताव देखने को मिला वो बहुत ही शर्मनाक था। दिल्ली गैंग रेप मामले के खिलाफ लोगों का गुस्सा चरम पर था। हज़ारों युवा अपने गुस्से का इज़हार करने के लिये रविवार को भी रायसीना हिल्स और संसद की तरफ जाना चाहते थे। प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या में युवतियां भी शामिल थी। लेकिन पुलिस ने रास्ते में ही उन्हे रोक लिया। पुलिस ने पहले वॉटरकैनन का प्रयोग किया और बाद में लाठीचार्ज कर दिया। पुलिसवालों ने महिलाओं और युवतियों को भी नही बख्शा। जब हमारे मीडिया के कुछ साथी दिल्ली पुलिस की इस करतूत को कैमरे में कैद कर रहे थे। तो पुलिस वालों ने उन्हे भी अपना निशाना बना लिया। कई पत्रकार साथियों का चोट आयीं हैं। और कैमरे भी क्षतिग्रस्त हो गये। पुलिस की इस हरकत पर कोई कुछ कहने को तैयार नही। हालात इतनी बुरी हो गयी कि दिल्ली की मुख्यमंत्री के पुत्र और कांग्रेस सांसद संदीप ने खुद अपनी ही पार्टी की सरकार से दिल्ली के पुलिस कमीश्नर को हटाने की मांग कर डाली। इस घटना से पत्रकारों में रोष है।
उधर, रविवार को ही उत्तराखंड़ की राजधानी देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़ वाइरस समाचार समूह के सम्पादक सलीम सैफी परिवार समेत बाल बाल बच गये। किसी ने साजिशन उनकी सेन्ट्रों कार में आग लगा दी। ये हादसा तब हुआ जब सलीम सैफी अपने परिवार के साथ बाज़ार आये हुये थे। उन्होने अपनी कार पार्किंग में खड़ी की थी। जब वो लौटकर आये तो उन्हे पेट्रोल की गंध आयी लेकिन बाहर कुछ नही था जैसे ही उन्होने अपनी कार स्टार्ट की तभी कार में आग लग गयी। सलीम सैफी ने उनकी पत्नी और दोनों बच्चों को फुर्ती के साथ कार से बाहर निकाला और कार कुछ पल में ही धूं-धूं कर जल उठी। राहत की बात ये है कि इस हादसे में सलीम सैफी और उनका परिवार बाल-बाल बच गये। इस हादसे को वरिष्ठ पत्रकार सलीम सैफी के खिलाफ एक बड़ी साजिश माना जा रहा है। उत्तराखंड़ में उनके कई विरोधी हैं। जिनको इस घटना से जोड़कर देखा जा रहा है। पुलिस ने मामले की जांच शुरु कर दी है। इस हादसे से साफ हो गया है कि सलीम सैफी देहरादून में सुरक्षित नही हैं।मैं इन दोनों घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। और अपने सभी पत्रकार साथियों से अपील करता हूँ कि सभी एक मंच पर आकर इन घटनाओं की निंदा करें। ताकि हम सुरक्षा की भावना के साथ अपना काम कर सकें और सही ख़बर और सच जनता तक पहुंचाते रहें।-परवेज़ सागर

Wednesday, December 19, 2012

बलात्कारियों को मिले मौत की सज़ा...


दिल्ली गैंग रैप मामले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। घटना देश की राजधानी में हुई तो ये मामला सुर्खियों में आ गया। लेकिन इस तरह की घटनाऐं उत्तर प्रदेश समेत कई उत्तर भारत में रोज़ाना  हो रही हैं। जो समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और घटती मर्यादा का प्रतीक है। लेकिन अफसोस की बात ये है कि इस तरह की घटनाऐं जब छोटे शहरों में होती हैं तो हमारी मीडिया और पुलिस दोनों ही इन्हे हल्के में लेते हैं। जब हम ऐसी घटना की जानकारी अपने समाचार चैनल के मुख्यालय पर देते हैं तो हमसे पीड़ित महिला या बच्ची का प्रोफाइल पूछा जाता है। पीड़िता अगर सम्पन्न परिवार की हो तो हमें स्टोरी करके भेजने के लिये कहा जाता है लेकिन अगर पीड़िता ग़रीब या लो-प्रोफाइल की हो तो स्क्रोल तक सिमट जाती है। यही हाल पुलिस का है मामला अगर हाई-प्रोफाइल हो तो पुलिस एक्टिव नज़र आती है। और अगर पीड़िता लो-प्रोफाइल है तो पुलिस भी खानापूर्ति कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर लेती है। और अब तो हद हो गयी है बलात्कार की शिकार महिलाओं को उनकी जाति के नाम से भी प्रचारित किया जाने लगा है। ख़बरों की सुर्खियों में भी इसका असर होने लगा है। कई समाचार चैनल और अखबार दलित महिला से बलात्कार जैसे वाक्य लिखने में गुरेज़ नही करते हैं। अफसोस की बात है कि यहां पर भी जाति और धर्म देखा जाने लगा है।
नेशलन क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की माने तो भारत में रोज़ाना 72 महिलाओं के साथ रैप हो रहा है। और सबसे देश के सबसे सुरक्षित प्रदेश दिल्ली में ये औसत इस से ज्यादा है। अब पूरे देश में  बलात्कारियों को मौत की सज़ा दिये जाने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। वाकई बलात्कार और बाल यौन शौषण जैसे जघन्य अपराध में शामिल लोगों के लिये इसी तरह की कड़ी सज़ा का प्रावधान होना चाहिये। और बलात्कार या यौन शोषण की शिकार महिला, लड़की या बच्ची को जाति और धर्म के आधार पर नही बल्कि पीड़िता के आधार पर ही देखा जाना चाहिये।
हम सभी को इस जघन्य अपराध के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाने की ज़रुरत है वरना आने वाले दिनों में घर से बाहर निकलने वाले महिला या स्कूल जाने वाली हमारी बच्चियां भी सुरक्षित नही रहेंगी। ऐसे बलात्कारियों के खिलाफ मौत की सज़ा का प्रावधान और यौन शौषण में शामिल लोगों को कड़ी सज़ा की मांग मुझे जायज़ नज़र आती है। हम सभी को मिलकर इस मांग को मजबूती देनी चाहिये ताकि सरकार ऐसे कानून पर विचार करे। और महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाले ऐसे अपराधों पर रोक लगाने के लिये ठोस कदम उठाये जायें।
-परवेज़ सागर

Friday, November 2, 2012

पर्दाफाश तूफान से नेता परेशान

अमरीका में 'सैंड़ी' और भारत में अरविंद केजरीवाल कोहराम मचा रहे हैं। अमरीका में जानलेवा तूफान से कोई बड़ा नुकसान हो या ना हो लेकिन भारत में अरविंद के पर्दाफाश तूफान से कई बड़े नेताओं की साख पर सवाल उठ खड़े हैं। कई लोगों का मानना है कि अरविंद के खुलासों की तेज़ी देखकर लगता है कि वाकई ये कमाल है का काम कर रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नही है जो इसे महज़ पब्लिसिटी स्टंट करार दे रहे हैं। लोगों का क्या है वो तो कहते रहेंगे लेकिन ज़रा उन नेताओं की सोचिये जो खुलासों के बाद सफाई देने या खुद को बचाने की कोशिश में लगें हैं और जो बच गये हैं वो इस लिये परेशान हैं कि अगला नम्बर कहीं उनका तो नही। परेशानी की वजह जायज़ भी है क्योंकि ये सारे राजनीति के इस हमाम में नंगे जो हैं।

Thursday, September 13, 2012

क्या सुरक्षित है यमुना एक्सप्रैस-वे ?

यमुना एक्सप्रैस-वे पर सफर करने की चाह रखने वालों के लिये ये बुरी ख़बर हो सकती है। लोग दो घंटे में दिल्ली पंहुचने की चाह में सबसे ज़्यादा टोल टैक्स देकर नोएडा-आगरा यमुना एक्सप्रैस-वे पर जा रहे हैं। लेकिन आये दिन वहां होने वाले किसान आंदोलन यात्रियों के लिये परेशानी का सबब बन रहे हैं। किसान कभी भी कहीं भी आकर एक्सप्रैस-वे पर धरना देने बैठ जाते हैं। जिसकी वजह से इस अंर्तराष्ट्रीय स्तर के मार्ग पर सफर करने वाले घंटों के जाम में फंस कर रह जाते हैं। यहां हालात भी ऐसे हैं कि पुलिस को यहां पंहुचने में घंटों लग जाते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ये एक्सप्रैस-वे फिलहाल सुरक्षित नही है। ना तो इस पर पुलिस चौकी ही बनी हैं और ना ही सीसीटीवी काम कर रहे हैं। सबसे अहम बात ये कि इस एक्सप्रैस-वे पर टोल प्लाज़ा को छोड़कर कहीं भी लाइट का इंतज़ाम नही है। ऐसे में इसकी सुरक्षा का अंदाज़ा लगा पाना कोई मुश्किल काम नही है।

Wednesday, August 15, 2012

जश्न-ए-आज़ादी पर सवाल- क्या हम आज़ाद हैं ?


आप सभी को जश्न-ए-आज़ादी मुबारक।
लेकिन....
अहम सवाल ये है कि क्या हम आज़ाद हैं ?
हमारे मुल्क ने 15 अगस्त 1947 को भले ही अंग्रेजों से आज़ादी हासिल कर ली थी लेकिन आज के इस दौर में हम एक बार फिर से गुलाम होते जा रहे हैं। पश्चिमी सभ्यता के गुलाम... भ्रष्टाचार के गुलाम... धर्म, वर्ग, बिरादरी और जातिवाद के गुलाम.......
क्या हमारे देश की आज़ादी के लिये खून बहाने वालों ने ये सब सोचकर ही अपना खून बहाया था। मुल्क के लिये मौत को गले लगाने वाले धर्म, वर्ग, बिरादरी और जातिवाद से ऊपर उठकर सिर्फ आज़ादी के लिये लड़ रहे थे। उन्होने ना तो कभी ऐसा सोचा था और ना ही कभी ऐसी कल्पना की थी। लेकिन उसके बावजूद क्या हो रहा है देश में... क्या कोई ऐसा आम आदमी है जो कहे कि हां मैं खुश हूँ। स्वतंत्रता दिवस पर हाथ में तिरंगा उठा कर चलने वाले आम आदमी के हालात किसी से छिपे नही हैं। आज़ादी के साठ दशक पार हो जाने के बाद भी भले ही सरकारी आंकड़ों और नेताओं के भाषणों में हमने तरक्की कर ली हो लेकिन हकीकत ये है कि आज भी झंडा फहराने पर दो लड्डू पाकर जश्ने आज़ादी मनाने वाला आम आदमी ज़ुल्म का शिकार है। चाहे सरकार हो या अफसर शाही हर जगह वही निशाना बनता है। हर बार वही शोषण का शिकार बनता है। जब सुबह से शाम तक कई सरकारी दफ्तरों में बूढ़े लाचार लोगों को अफसरों के दफ्तरों में पेंशन पाने के लिये चक्कर लगाते देखता हूँ तो मन में सवाल आता है क्या कसूर है इनका ?  सवाल तो और भी कई उठते हैं लेकिन आज़ादी पाने का क्या अर्थ है वो यहां ज़्यादा ज़रुरी हो जाता है। सड़कों पर भीख मांगते बच्चें और औरतें... रात में फुटपाथ पर सोते सैंकड़ों लोग। नौकरी के लिये मारे मारे घूमते युवा। सब आज़ादी के मायनों पर सवाल से उठाते नज़र आते हैं। गुलाम भारत के बारे में जितना पढ़ा और सुना है उसके आधार पर तो ऐसा लगता है कि कुछ बदला ही नही है। सब वैसा ही है बस अंग्रेजों की जगह हमारे लोगों ने ले ली है। वरना सब कुछ वैसा ही है। वही कानून... वही सिस्टम...... वही पुलिस... वैसे ही अत्याचार...... तो आम आदमी के लिये क्या बदला ? समझना ये होगा कि आज देश की आम जनता को मोबाइल, लैपटाप या टैब की नही बल्कि रोटी और रोज़गार की ज़रुरत है।
आज़ादी के मायने सिर्फ अंग्रेजों का भाग जाना नही बल्कि देश की विकास था.... हर बेरोज़गार को रोज़गार था.... अत्याचारों से मुक्ति था.... समान अधिकार देने वाला तंत्र था... भ्रष्टाचार मुक्त समाज था। लेकिन आज इस 15 अगस्त पर हम किस मोड़ पर खड़ें हैं ये सोचने वाली बात है। वरना अगले साल फिर 15 अगस्त आयेगा... हमारे दिल में देशभक्ति का तूफान उठेगा... तिरंगा लहरायेगा... जश्न होगा और 16 अगस्त से फिर हम अपने काम पर लग जायेंगे। यही सब जारी रहेगा...
और देश की आज़ादी के असली मायने फिर कहीं अंधेरों में खो जायेंगे।
हम यूँ ही सब सहकर जीते रहेंगे
और...... एक दिन मर जायेंगे।

Monday, August 13, 2012

रामलीला मैदान में ये कैसी लीला ?


अन्ना की दुकान बंद होने के बाद रामलीला मैदान में बाबा रामदेव ने रामदेवलीला शुरु की थी। 9 अगस्त से रामलीला मैदान में डटे बाबा को समझ ही नही आ रहा था कि अब आगे क्या करें। लेकिन केन्द्र सरकार ने आज बाबा को छेड़कर खुद ही इस मामले को तूल दे दिया। दरअसल केन्द्र सरकार ने पहले की तरह इस आंदोलन को निपटाने का कार्यक्रम बना लिया है। जिसके चलते बाबा को समर्थकों के साथ हिरासत में लेकर डीटीसी बस के ज़रिये बवाना में बनाई गयी अस्थाई जेल में ले जाया जा रहा है। लेकिन भारी भीड़ जुट जाने की वजह से दिल्ली के कई इलाकों में जाम लग गया है। ऐसा लग रहा है कि दिल्ली में हर तरफ जामलीला हो रही है। हम सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। हम भी चाहते हैं कि विदेशों में जमा काला धन वापस आये। लेकिन इस मसले को लेकर चल रही अन्नालीला या रामदेवलीला की वजह से क्या कोई हल निकल सकता है। उल्टा इनके ये आन्दोलन दिल्ली के आम लोगों के लिये परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं और केन्द्र सरकार के कान पर जूं तक नही रेंग रही है। सब आँखें बंद किये बैठे हैं। परेशान हो रहा है तो सिर्फ वो आम आदमी जिसका हवाला देकर सरकार और समाज के ठेकेदार अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। हम आम लोगों को इस बारे में सोचना चाहिये कि क्या सही है और क्या ग़लत? हम कब तक इस्तेमाल होते रहेंगे ????

Monday, May 28, 2012

केन्द्र सरकार का नया शिगुफा.....


केन्द्र सरकार शायद को जनता को बेवकूफ समझ रही है या फिर जनता को भोली जानकर मनमानी कर रही है। पहले पेट्रोल के दाम साढे सात रुपये बढाकर महंगाई के बोझ में दबे आम आदमी की कमर तोड़ दी। अब नया शिगुफा ये कि सरकार पेट्रोल की कीमतों में डेढ़ रुपये तक की कटौती कर आम आदमी को राहत देने की बात कर रही है। अगर ऐसा भी होता है तो फिर भी छः रुपये प्रति लीटर ज्यादा का बोझ आपकी जेब पर पड़ता रहेगा। ऐसा लगता है केन्द्र सरकार ने जनता को बहलाने का ये तरीका स्थाई कर दिया है जब मन में आया पेट्रोल के दाम बढ़ा दो और फिर कुछ मामुली दाम घटाकर जनता को राहत की बात करो। आम आदमी का क्या वो तो पिस रहा है और पिसता रहेगा। एक दिन चिल्लाऐगा, नारेबाज़ी करेगा और फिर अपने काम में लग जायेगा। वो इसके अलावा कुछ कर भी नही सकता। लेकिन ऐसे हालात में सरकार अपने मकसद में कामयाब नज़र आती है। पर सरकार ये भूल गयी है कि लोकसभा का आम चुनाव सर पर है। अब फैसला जनता को करना है क्योंकि अहम सवाल ये है कि क्या यूपीए फिर से देश पर राज करने के काबिल है ? आप ही बताइये।

Wednesday, May 16, 2012

UNICEF Media Workshop at Agra


UNICEF organized a two days workshop for media’s role in supporting routine immunization at Agra. UNICEF official says that media is a key stakeholder in development issue and it is important to information for common people. I participated in this workshop with known journalist Mrs. Usha Rai & Mr. Ashwani Bhatnagar. It was wonderful experience with unicef team.