Monday, May 11, 2009

ज़िन्दगी को मौत के पहलू मे पाता हूँ....

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ऐ काश देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को,
मैं जब तारों पर नज़रें गड़ाकर आंसू बहाता हूं
तसव्वुर बन के भूली बातें याद आती हैं,
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्‍दत से पहरों तिलमिलाता हूं
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबिदा उमंगों को जगाती है,
तो अपनी ज़िन्दगी को मौत के पहलू में पाता हूं
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Wednesday, April 22, 2009

वतन में बेवतन क्यूं है?

ज़ुबान-ए-हिन्द है उर्दू तो माथे की शिकन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

मेरी मज़लूम उर्दू तेरी सांसों में घुटन क्यूं है
तेरा लहजा महकता है तो लफ़्ज़ों में थकन क्यूं है
अगर तू फूल है तो फूल में इतनी चुभन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

ये नानक की ये खुसरो की दया शंकर की बोली है
ये दीवाली, ये बैसाखी, ये ईद-उल-फ़ित्‍र, होली है
मगर ये दिल की धड़कन आजकल दिल की जलन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

ये नाज़ों से पली थी मीर के ग़ालिब के आंगन में
जो सूरज बन के चमकी थी कभी महलों के दामन में
वो शहज़ादी ज़ुबानों की यहां बे-अन्जुमन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

मुहब्बत का सभी ऐलान कर जाते हैं महफ़िल में
कि इस के वास्ते जज़्बा है हमदर्दी का हर दिल में
मगर हक़ मांगने के वक़्त ये बेगानापन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

ये दोज़ीशा जो बाज़ारों से इठलाती गुज़रती थी
लबों की नाज़ुकी जिस की गुलाबों सी बिखरती थी
जो तहज़ीबों के सर की ओढ़नी थी अब कफ़न क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

मुहब्बत का अगर दावा है तो इसको बचाओ तुम
जो वादा कल किया था आज वो वादा निभाओ तुम

अगर तुम राम हो तो फिर ये रावण का चलन क्यूं है
वतन में बेवतन क्यूं है?

Tuesday, March 24, 2009

वो कमरा बात करता था.....



मैं अब जिस घर मे रहता हूँ

बहुत ही खूबसूरत है।

मगर अक्सर यहां

खामोश बैठा याद करता हूँ........

वो कमरा बात करता था।

वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा...

मुझसे मरकर भी ना जाएगी वतन की उलफ़त,
मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वतन आएगी

- भगत सिंह

Wednesday, March 11, 2009

होली मुबारक

आप सभी को होली की ढेरों शुभकामनाऐं। आईये इस होली पर हम सब हिन्दुस्तानी मिलकर भाईचारे और सौहार्द का एक ऐसा रंग तैयार करें जो आतंकवाद रुपी दाग़ पर इस तरह से चढे कि वो दाग हमारे देश की सरज़मी से हमेशा के लिये मिट जाये। एक बार फिर कलम के सभी सिपाहियों को होली की मुबारकबाद...
आपका..
परेवज़ सागर

Saturday, March 7, 2009

नेता जी कह रहें हैं कि.....







दुनिया ये समझती है...

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़मों से नफ़रत है,
मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है
मेरी फ़ितरत को खूं-रेज़ी के अफ़सानों से रग़बत है,
मेरी दुनिया में कुछ वक़त नहीं है रक़्स-ओ-नग़मे की
मेरे महबूब नग़मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है।

ज़िन्दगी से जुड़े कुछ अशआर

तुम तकल्लुफ को भी इखलास समझते हो फ़राज़,
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
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कोई काँटा चुभा नहीं होता
अगर फूल सा नहीं होता,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।
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ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे,
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे।

Wednesday, December 31, 2008

अलविदा-2008


साल 2008 का अन्तिम सूर्यास्त
जैसे कह रहा हो :-



सूरज हूँ ज़िन्दगी की रमक छोड़ जाऊँगा,
मैं डूब भी गया तो शफक छोड़ जाऊँगा।

Thursday, December 25, 2008

MERRY CHRISTMAS

Wish you All


A Very Merry



CHRISTMAS